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पीएम मोदी का अगला बड़ा मास्टरस्ट्रोक: जानिए ‘एक देश, एक चुनाव’ से कैसे बदल जाएगा भारतीय राजनीति का चुनावी कैलेंडर

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नई दिल्ली: देश की राजनीति में इस समय ‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) का विचार केवल एक बौद्धिक बहस या चुनावी नारा नहीं रह गया है, बल्कि इसके क्रियान्वयन की रणनीतिक तैयारियों ने सियासी तपिश बढ़ा दी है। संसद की संयुक्त समिति वर्तमान में संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की गहन जांच कर रही है। इन विधेयकों की मूल वैधानिक रूपरेखा के तहत देश में लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ एक चक्र में लाने की पहली औपचारिक संभावना वर्ष 2034 से बनती है। लेकिन राजनीतिक सत्ता के गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या सत्ता पक्ष 2034 तक इंतजार करने के बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव में ही इसका बड़ा रणनीतिक प्रयोग कर सकता है?

🗓️ 2029 में 22 राज्यों के साथ चुनाव का क्या है सियासी गणित?

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के शासन वाले 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के चुनावी कैलेंडर पर नजर डालें तो इनमें से 11 राज्यों में अगले दो वर्षों के भीतर विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। यदि इन राज्यों में एनडीए अपनी सत्ता बरकरार रखता है, तो 2029 में लोकसभा चुनाव के साथ इन्हें एक साझा चुनावी चक्र में लाने के लिए जनवरी 2029 तक विधानसभाएं भंग करने का रणनीतिक विकल्प सामने आ सकता है।

विदित रहे कि आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिशा में विधानसभा चुनाव पहले से ही लोकसभा चुनाव के साथ ही संपन्न होते रहे हैं। ऐसे में इन चार राज्यों के साथ अन्य एनडीए शासित राज्यों को जोड़ना राजनीतिक रूप से अपेक्षाकृत सुगम माना जा रहा है।

⚖️ अनुच्छेद 174(2)(b) और संवैधानिक खिड़की

राजनीतिक और कानूनी विश्लेषक इस पूरी कवायद में संविधान के अनुच्छेद 174(2)(b) को केंद्र में देख रहे हैं। यह अनुच्छेद राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह पर विधानसभा भंग करने का अधिकार प्रदान करता है। विधानसभा भंग होने के उपरांत लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) के तहत निर्धारित छह माह की समय सीमा के भीतर चुनाव कराना संवैधानिक बाध्यता होती है। इसी संवैधानिक खिड़की का उपयोग कर 2029 के आम चुनावों के साथ राज्यों के विधानसभा चुनावों को समन्वित करने की संभावनाओं पर विचार चल रहा है।

🗣️ JPC अध्यक्ष पी.पी. चौधरी का बयान: “मुख्यमंत्रियों पर निर्भर करेगा फैसला”

दिसंबर 2024 में गठित संसद की संयुक्त समिति (JPC) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने इस संभावना पर स्पष्ट रूप से कहा है कि 2029 में चुनावों को समय से पूर्व आगे बढ़ाकर एक साथ कराने का निर्णय संयुक्त संसदीय समिति के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह पूरी तरह संबंधित एनडीए मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों के राजनीतिक निर्णय पर निर्भर करेगा।

समिति विभिन्न राज्यों के दौरों में सरकारों, विधायिकाओं, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज से संवाद कर रही है और उसकी अंतिम रिपोर्ट संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में प्रस्तुत होने की संभावना है।

🛡️ चुनावी लाभ बनाम विपक्ष की तीखी आपत्तियां

एनडीए के लिए एक साथ चुनाव कराने की यह योजना चुनावी संसाधनों की बचत, मजबूत संगठनात्मक ताकत और राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता का दोहरा लाभ उठाने का बड़ा अवसर बन सकती है। एक ही समय में चुनाव होने से राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव राज्य-स्तरीय स्थानीय समीकरणों पर हावी हो सकता है।

दूसरी ओर, विपक्षी दल इस पूरी अवधारणा के खिलाफ एकजुट नजर आ रहे हैं:

  • कांग्रेस का कड़ा रुख: मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का तर्क है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ की यह परिकल्पना असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और संसदीय जवाबदेही के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
  • 5 साल के जनादेश पर सवाल: विपक्ष का कहना है कि जब जनता किसी राज्य सरकार को 5 वर्ष का पूर्ण जनादेश देती है, तो राजनीतिक सुविधा और राष्ट्रीय चुनाव के समन्वय के नाम पर विधानसभा का कार्यकाल 3 या 4 वर्ष में समाप्त करना मतदाताओं के अधिकारों और भारतीय संघीय ढांचे (Federal Structure) के साथ गंभीर अन्याय होगा।
  • विपक्ष शासित राज्यों की जटिलता: पंजाब (2027), हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मिजोरम और तेलंगाना (2028) जैसे गैर-एनडीए राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 2029 तक केवल एक या दो वर्ष का होगा, जिसे लेकर अलग कानूनी और राजनीतिक विवाद खड़ा होना तय है।

यह स्पष्ट है कि 2029 का संभावित परिदृश्य केवल चुनावी तारीखों का मिलान नहीं होगा, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में केंद्र बनाम राज्य, राष्ट्रीय बनाम क्षेत्रीय अस्मिता और चुनावी दक्षता बनाम लोकतांत्रिक विविधता की एक ऐतिहासिक राजनीतिक लड़ाई का मंच तैयार करेगा।

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